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हमारी बनावट कुछ ऐसी है  कि जब हम किसी राह देख रहे होते है तो हम उन्हें वहाँ से देखना चाहते है  जहां तक हमारी नज़र जा सकती है। हमें ये अच्छे से पता है कि वो हम तक ही पहुँच रहे है,  अंत में वे हमारे सामने वाले दरवाज़े हो कर ही निकलेंगे।  पर नही।  हम पूरा ज़ोर लगा कर अपने पंजों पे दम  लगा कर उन्हें जितना दूर हो सके उतनी दूर से आता देखना चाहते है। आप जिसे चाहते है उसका आप तक पहुँच जाना एक उपलब्धि है, उन्हें दूर से  आता देखना एक औषधि है ।

भ्रांति

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आप सोचते है लंबी छुट्टी पर कहीं बाहर घूम आये, कैसे भूल जाते है कि बाहर ही तो है पहले से।     आपको लगता है की अभी तो वक़्त है आपके पास आपको लगता है की अभी वक़्त है उनके पास। आपको याद बहुत आती है घर की, मगर आप जता नहीं पाते। आपका क़सूर भी तो नहीं है, काफ़ी सारी उलझनों में ख़ुद फ़से हुए है। आपको लगता है कि वक़्त धीरे धीरे तो बीत रहा है, फिर किसी दिन भरपाई हो जाएगी। आपको लगता है सब कुछ ठीक तो चल रहा है, कुछ दिनों पहले ही तो हाल चाल लिए थे। फिर किसी दिन घर से फ़ोन आता है, दिल को झिंझोड़ देने वाली आवाज़ में । "जल्दी आजाओ" इतनी भी क्या जल्दी? अभी कल तक तो सब ठीक था। हल्का सा बुख़ार ही तो था। आप ख़ुद को बहलाने समझाने में जुट जाते है रास्ते भर। घर पहुँचते है तो कैसे सब पानी में धूल जाता है गलती आपकी थी, ये एहसास हो जाता है। वो आख़िरी बार जो बात हुई थी, बात ना हो पाने पर। वही बात आपके मन को आख़िरी दम तक तकलीफ़ देगी । और अबकी बार फ़ोन उठा कर भरपाई भी नहीं हो पाएगी। यही सज़ा है, सही सज़ा है । चंद तकिया कलाम, और गुनगुने पानी जैसे गीतों के एहसास बस यही साथ रहेंगे अब और कहीं जाना भी नहीं पड

कोई नहीं

चौके   सब ,  बूझे   कुछ ,  पर   समझा   कोई   नही   । निकले   सब ,  भागे   कुछ ,  पर   पहुंचा   कोई   नही   । उपर सब , बाहर कुछ , पर भीतर कोई नहीं । मांगे सब , छीने कुछ , पर पाए कोई नहीं । रुके सब , छुपे कुछ , पर बचा कोई नहीं । चहके सब , चीखे कुछ , पर बोला कोई नहीं । डिगे   सब , जागे कुछ , पर उठा कोई नहीं । बिछड़े सब , याद कुछ , पर छूटा कोई नहीं । याद सब , पास कुछ , पर साथ कोई नहीं । आए सब , रुके कुछ , पर रहा कोई नहीं ।    

जब अटल जाता है

तू तू है, मैं मैं हूँ तू अलग मैं अलग, रोज़ाना... मगर दुःख के पलों में ये मंज़र बदल जाता है, भीगी आँखे लिए, हाथ थामें बिलखते है दोनों... जब कलाम जाता, जब अटल जाता है ।

अब सहर से परे नहीं है रातों की आवाज़

अब सहर से परे नहीं है रातों की आवाज़, पौ फटते ही पता चलेगा कितनी लंबी रात। बेचैन सी उहापोह फिर सन्नाटे की काट, चिंता से तो सन्नाटे की कर्क ध्वनि ही माफ़। ऐसा भी क्या तेज़ प्रताप के सब कुछ कर दे राख, वैसे तो चूल्हे के भीतर भी होती है आँग। किसको थोपें दुखड़े अपने कितनी कर लें बात, दुश्चिंता है अपनी अपनी यूँ ही सबके पास। थके हुए इन शब्दों से भी कितना ले लें काम, लोक गीत कब बन पाई है कृमिकों की आवाज़ । भर छागल में ठंडा पानी छागल रक्खी ताक़, सबकुछ होकर कुछ न होना यह कैसा एहसास। सुख दुःख, पीड़ा, खोना पाना सब जीवन का भाग, फिर ऐसा भी क्या भिन्न भला है इंद्रधनुष के पार। गरम तवे पर  ठंडा पनी, सिसकी की आवाज़, उजड़े मन से मत ही रक्खो चंचलता की आस । छोटा मुँह और बात बड़ी हो या बड़े की छोटी बात, अभियोग भले हो अचरज कैसा इतना करता कौन विचार  | थोड़ा अपने भीतर देखें थोड़ा तन के पार, नम नयनो मे कैसे लग गई इतनी भीषण आँग । पहले गिरना, गिर कर उठना कितना अच्छा भाव, गिरते उठते गिरते रहना यही  कठोर यथार्थ । अब सहर से परे नहीं है रातों की आवाज़, पौ फटत

साल का इनाम

कई सालों में एक साल आता है हम उसको मामूली समझ बैठते है, मज़ाक बना रखते है, लेकिन वो गंभीर होता है,  वो चुपचाप दबे पैरों से लगातार चलते रहता है, हमको हसाता है, ख्वाब दिखाता है  गिराता है, उठाता है। पर क्या चाहता है, इसकी  भनक तक नहीं लगने देता। फिर एक दिन जाते जाते, जब वो सबसे ज़्यादा चंचल होता है, वो हमसे हमारा सुकून, उड़ा ले जाता है। वैसे ही जैसे, तेज़ आँधी, बरीश की बूँदो को। और हम लाचार है, हसने को, जब वो हँसता है। रोने को, जब वो गिरता है। और चुप चाप, बिना जताए, बुत की तरह, सहन करने को, जब वो अपना इनाम समझ कर, हमसे हमारा कोई माँगs लेता है । कई सालों में एक साल आता है जिसे हम मामूली समझ बैठते है।

रेशम का बिछोना

आलीशान, खूबसूरत, सबसे कोमल, सबको होना है । सबसे रूठे, हारे थके जब, इसपर गिरकर रोना है। झट आँसू सूखे मन बहले, फिर जा बिस्तर पे सोना है । पैरों में रक्खे इतराते, इस दुनिया में इस से दो ना है । तकिए कम्बल बिस्तर पे, उसके हिस्से में कोना है । सबका चहेता, सबसे कोमल, रेशम का बिछोना है ।

ये लेख है

यह लेख है, कविता नहीं है। कविता प्रार्थना की भाँति होती है , चाहे उसमें याचना ही हो । कविता आह्वान की भाँति होती है , चाहे उसमें ग़ुस्सा ही हो । कविता आराधना की भाँति होती है , चाहे उसमें पीड़ा ही हो । कविता अनशन की भाँति होती है , चाहे उसमें शिकायत ही हो । प्रार्थना, आह्वान,  आराधना, अनशन, तब सार्थक हो जाते है, जब उस तक पहुँच जाते है  जिसको स्मरण करके उनकी रचना हुई हो । परंतु  यह लेख है।

आंदोलन

देश में बंद के समर्थक कार्यकर्ताओं ने  आज के आंदोलन के लिए, सफ़ेद shirt-pants  कल ही  धुलवा के इस्तरी करवा ली थी । आज भारत बंद जो है, धोबी की दूकान भी बंद रहेगी। कैसे नहीं रहेगी ।

एक धुन बज रही है मेरे गाँव में

एक धुन बज रही है मेरे गाँव में अजीब, काली सी अनजान सी धुन है  | मायूसी है, खामोशी है,  चहचहाहट के फ़ुक़्दान में एक सुनसान सी धुन है  | कल रविवार है, फिर भी आँगन खली है, गालियाँ चुप हैं, परसो इम्तहां भी नहीं | अभी तो हुई है सहर इस साल की, एक ढलती शाम सी धुन है | शीशे बरकार, नालियों में गेंद नहीं कोई भी डॉक्टर इंजीनियर पायलेट मैदान में नहीं | शांति नहीं है, सन्नाटा है, एक कोहराम सी धुन है | बड़े संभाल के रख रखा था, बरनी में बंद कर के, ऊपर के आले पे, एक तूफान को कभी बरनी टूटी और शहर गूँज उठा, एक तूफ़ान सी धुन है  | तुमने नहीं सुनी? ध्यान से सुनो काली सी  मठमैली सी, लाल यूनिफार्म में, एक हैवान सी धुन है | कल तो  रविवार है, शहर के अस्पतालों में फिर क्यों ये परेशान सी धुन  है अजीब बात है |